REMOTE SENSING SCIENCE GROUP E RENESHA IAS

RENESHA IAS BY RAVI SIR 
(DIRECTOR RENESHA IAS) 
15TH JPSC FOUNDATION 
14th JPSC SUPERFAST BATCH 
PROJECT MANAGER CDPO INTERVIEW 9661163344...

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🇮🇳 सुदूर संवेदन (Remote Sensing)
और इसके अनुप्रयोग🇮🇳
ARTICLE BY RAVI SIR
RENESHA IAS
JPSC MAINS FOUNDATION
SCIENCE GROUP E

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        सुदूर संवेदन (Remote Sensing) एक आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक है जिसके माध्यम से पृथ्वी की सतह, वातावरण या किसी वस्तु के बारे में बिना सीधे संपर्क किए जानकारी प्राप्त की जाती है। इसमें इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम (Electromagnetic Spectrum) की विभिन्न तरंगदैर्ध्यों जैसे

👉    Visible,
👉  Infrared,
👉   Microwave

आदि का उपयोग किया जाता है। उपग्रह, ड्रोन या विमान पर लगे सेंसर पृथ्वी की सतह से

👉  परावर्तित या
👉   उत्सर्जित ऊर्जा को रिकॉर्ड करते हैं और

इस डेटा का विश्लेषण करके विभिन्न भौगोलिक, पर्यावरणीय और संसाधन संबंधी जानकारी प्राप्त की जाती है। 


सुदूर संवेदन के मुख्य घटकों में

👉   ऊर्जा स्रोत (सूर्य या कृत्रिम ऊर्जा), वातावरण, लक्ष्य (पृथ्वी की सतह), सेंसर और डेटा प्रोसेसिंग प्रणाली शामिल होती है। इसे मुख्यतः दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है – पैसिव रिमोट सेंसिंग, जिसमें सूर्य से प्राप्त ऊर्जा को रिकॉर्ड किया जाता है, तथा एक्टिव रिमोट सेंसिंग, जिसमें सेंसर स्वयं ऊर्जा (जैसे रडार तरंगें) भेजता है और उसके परावर्तन को मापता है।

🌹scientific aspects : process🌹




Steps 
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1)   Sun Light (सूर्य का प्रकाश) 
          सूर्य से ऊर्जा (Electromagnetic radiation) निकलती है और पृथ्वी की ओर आती है।  यही ऊर्जा Remote sensing का मुख्य स्रोत होती है।
2)  Atmosphere (वायुमंडल) 
  सूर्य की किरणें वायुमंडल से होकर गुजरती हैं।  वायुमंडल कुछ किरणों को अवशोषित (absorb) या प्रकीर्णित (scatter) कर देता है।
👉 उदाहरण: धूल, बादल, गैसें किरणों को प्रभावित करती हैं।
3)  Earth Features (पृथ्वी की वस्तुएँ) 
       जब सूर्य की किरणें पृथ्वी की सतह (जैसे – जंगल, पानी, शहर, मिट्टी) पर पड़ती हैं तो वे परावर्तित (reflect) हो जाती हैं। हर वस्तु अलग-अलग मात्रा में ऊर्जा परावर्तित करती है, जिससे उनकी पहचान संभव होती है।
4)   Satellite (उपग्रह) 
        उपग्रह में लगे sensor पृथ्वी से परावर्तित ऊर्जा को रिकॉर्ड करते हैं।
👉 अलग-अलग सेंसर अलग प्रकार की जानकारी लेते हैं
तापमान
वनस्पति
जल
भूमि उपयोग
5)    Antenna Receiver (ग्राउंड स्टेशन) 
     उपग्रह से प्राप्त डेटा पृथ्वी पर स्थित ग्राउंड स्टेशन (एंटीना) को भेजा जाता है।
6)   Computer Analysis (कंप्यूटर विश्लेषण) 
     कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की मदद से डेटा का विश्लेषण किया जाता है और इमेज / मैप बनाए जाते हैं।



🇮🇳अनुप्रयोग  🇮🇳



                भारत में ISRO द्वारा संचालित उपग्रह जैसे Resourcesat, Cartosat, RISAT, Oceansat, INSAT-3DR/3DS आदि सुदूर संवेदन डेटा के प्रमुख स्रोत हैं और इनका डेटा Bhuvan पोर्टल पर उपलब्ध कराया जाता है।


A)   आपदा चेतावनी
 ( Disaster Warning)


       सुदूर संवेदन (Remote Sensing) आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीक बन चुकी है, क्योंकि इसके माध्यम से उपग्रह, विमान या ड्रोन द्वारा बड़े क्षेत्रों की जानकारी तेजी से, सटीक और बार-बार प्राप्त की जा सकती है। 

1)    पूर्व-आपदा चरण (Mitigation & Preparedness) 

      इसमें इसका उपयोग खतरे का मानचित्रण (Hazard Mapping) करने, भूकंप, बाढ़, भूस्खलन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने तथा जोखिम  का आकलन करने में किया जाता है। आपदा पूर्व चेतावनी (Early Warning) में मौसम उपग्रहों से वास्तविक समय डेटा प्राप्त कर 
👉   चक्रवात, 
👉   सूखा और
👉     बाढ़ की निगरानी व पूर्वानुमान लगाया जाता है।

2) response 

      आपदा के दौरान प्रतिक्रिया (Response) चरण में प्रभावित क्षेत्रों की पहचान, जलमग्न क्षेत्र का मानचित्रण, सुरक्षित मार्गों का निर्धारण तथा बचाव कार्यों की योजना बनाने में सहायता मिलती है; विशेष रूप से SAR (Synthetic Aperture Radar) तकनीक बादलों या रात में भी सटीक चित्र प्रदान करती है.

3.  Recovery 

    आपदा के बाद (Recovery) चरण में सुदूर संवेदन के माध्यम से फसल, सड़क, भवन और अन्य संरचनाओं के नुकसान का आकलन तथा पुनर्निर्माण की योजना बनाना आसान हो जाता है। 
       भारत में ISRO और NRSC द्वारा चलाया जा रहा Disaster Management Support (DMS) कार्यक्रम बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन आदि की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सुदूर संवेदन, GIS के साथ मिलकर, कम समय में विश्वसनीय जानकारी देने और प्रभावी निर्णय लेने में सहायता प्रदान करता है, जिससे आपदा प्रबंधन अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी बनता है।



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APPLICATION REMOTE SENSING
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🇮🇳सुदूर संवेदन (Remote Sensing)
का मौसम पूर्वानुमान (Weather Forecasting)🇮🇳


      सुदूर संवेदन (Remote Sensing) मौसम पूर्वानुमान के क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी तकनीक है, क्योंकि इसके माध्यम से उपग्रहों द्वारा

👉    वायुमंडल, बादलों,
👉    तापमान, आर्द्रता और
👉     विभिन्न मौसम प्रणालियों की

       निरंतर निगरानी की जाती है।  इतना ही नहीं सुदूर संवेदन वास्तविक समय (Real-time) में बादलों की गति, चक्रवात, मानसून तथा पश्चिमी विक्षोभ जैसी मौसम घटनाओं की ट्रैकिंग में सहायता करता है।

      वर्तमान समय में विश्व के मौसम पूर्वानुमान का लगभग 90% डेटा उपग्रहों से प्राप्त होता है, जिससे बड़े क्षेत्रों के लिए सटीक और समय पर पूर्वानुमान संभव हो पाता है।
      
     इसके माध्यम से वायुमंडल के

👉   तापमान और आर्द्रता के ऊर्ध्वाधर प्रोफाइल ( अलग-अलग ऊंचाई पर तापमान और आद्रता)
👉   समुद्र सतह तापमान (SST),
👉   बाहर जाने वाले लॉन्गवेव रेडिएशन (OLR) तथा
👉   ओजोन की मात्रा का

      आकलन किया जाता है, जो मौसम के अध्ययन में महत्वपूर्ण होते हैं।

              यह तकनीक वर्षा की मात्रा और वितरण का अनुमान (Quantitative Precipitation Estimation) लगाने तथा बाढ़ जैसी आपदाओं की पूर्व चेतावनी देने में भी सहायक है।

              उपग्रहों से प्राप्त डेटा को Numerical Weather Prediction (NWP) मॉडलों में सम्मिलित करने से पूर्वानुमान की सटीकता और बढ़ जाती है, साथ ही Nowcasting के माध्यम से कुछ घंटों या दिनों के भीतर होने वाले मौसम परिवर्तनों, जैसे आंधी, कोहरा और बिजली, की जानकारी मिलती है।

       भारत में ISRO और IMD द्वारा INSAT-3D, INSAT-3DR, INSAT-3DS, Kalpana-1, SCATSAT-1 तथा Oceansat जैसे उपग्रहों का उपयोग मानसून, चक्रवात और कोहरे की निगरानी तथा कृषि मौसम सलाह देने में किया जाता है।

🌹लाभ 🌹

सुदूर संवेदन का प्रमुख लाभ यह है कि यह

👉    बड़े क्षेत्रों को कवर करता है, कम समय में बार-बार डेटा प्रदान करता है तथा
👉     समुद्र और पर्वतीय क्षेत्रों जैसे दुर्गम स्थानों से भी जानकारी उपलब्ध कराता है।

             यद्यपि ऑप्टिकल सेंसर बादलों या धुंध में सीमित हो सकते हैं, फिर भी माइक्रोवेव और हाइपरस्पेक्ट्रल तकनीकों के विकास से भविष्य में मौसम पूर्वानुमान और अधिक सटीक होने की संभावना है।
          इस प्रकार सुदूर संवेदन ने मौसम विज्ञान को अधिक वैज्ञानिक, विश्वसनीय और प्रभावी बनाया है तथा समय रहते चेतावनी देकर जान-माल की हानि को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


🇮🇳संसाधन प्रबंधन 🇮🇳


A)   Water Resources


       जल संसाधन (Water Resources) के प्रबंधन में भी सुदूर संवेदन का उपयोग व्यापक रूप से किया जाता है। इस तकनीक की सहायता से

👉    नदियों, झीलों और जलाशयों के क्षेत्रफल, जल स्तर और समय के साथ होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है।                       Landsat और Resourcesat उपग्रहों से प्राप्त डेटा से जलाशयों की क्षमता और जल वितरण का विश्लेषण किया जाता है।

👉    भूजल (groundwater) संभावित क्षेत्रों का पता लगाने के लिए भू-आकृति (geomorphology), मिट्टी की नमी (soil moisture) और lineaments का अध्ययन किया जाता है।

👉    बाढ़ और सूखा प्रबंधन के लिए flood inundation maps और NDVI आधारित drought assessment का उपयोग किया जाता है।

👉   जल की गुणवत्ता (water quality) जैसे turbidity, chlorophyll और प्रदूषण का अध्ययन hyperspectral sensors से किया जाता है।

👉    बर्फ और हिमनद (glaciers) की मोटाई और snow cover का अध्ययन RISAT और ASTER जैसे उपग्रहों से किया जाता है।

            सिंचाई प्रबंधन में वाष्पीकरण और soil moisture डेटा से फसलों की जल आवश्यकता निर्धारित की जाती है। समुद्री क्षेत्रों में समुद्री सतह का तापमान Sea Surface Temperature और algal bloom (पानी में शैवाल की असामान्य और तेज वृद्धि) की पहचान भी remote sensing द्वारा की जाती है।

       भारत में NRSC (National Remote Sensing Centre) जल संसाधन मानचित्रण, watershed management और reservoir sedimentation ( जलाशयों के अवसाद ) अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


B)     मिट्टी संसाधन (Soil Resources)


        मिट्टी संसाधन (Soil Resources)  के अध्ययन में भी remote sensing उपयोगी है। 

👉  इससे  मिट्टी के प्रकार (soil type), बनावट (texture), कार्बनिक पदार्थ (organic matter) तथा लवणता (salinity) का पता लगाया जाता है।

👉     Microwave आधारित remote sensing से मिट्टी की नमी (soil moisture) मापी जाती है, जो सूखा और बाढ़ के पूर्वानुमान में सहायक होती है।

👉   NDVI और SAVI जैसे सूचकांक से भूमि क्षरण (land degradation) और मिट्टी अपरदन (soil erosion) का अध्ययन किया जाता है।

👉    Precision agriculture में hyperspectral imagery के माध्यम से पोषक तत्वों की कमी और मृदा उर्वरता  ( nutrient deficiency और soil fertility )  का आकलन किया जाता है।

              Sentinel-2 और IRS उपग्रह डेटा से soil organic carbon, pH और salinity की जानकारी प्राप्त होती है। भारत में NRSC (National Remote Sensing Centre) के द्वारा 1:50,000 scale पर soil resource mapping की गई है, जो कृषि प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है।

C)   खनिज संसाधन (Mineral Resources)

            खनिज संसाधन (Mineral Resources) की खोज में remote sensing अत्यंत उपयोगी तकनीक है क्योंकि यह बड़े क्षेत्र का अध्ययन कम लागत में संभव बनाती है।

👉    multispectral और
👉   hyperspectral sensors

        की सहायता से विभिन्न खनिजों की spectral signature पहचान की जाती है।

          Landsat, ASTER और Hyperion ( सारे सेटेलाइट है सेंसर युक्त) डेटा से

👉     iron oxide, clay minerals और hydrothermal alteration zones का पता लगाया जाता है।

👉   इससे copper, zinc, gold जैसे खनिजों के संभावित क्षेत्र पहचाने जाते हैं।

        Structural mapping ( संरचनात्मक मैपिंग,  ....भ्रंश, दरार)    से mineral deposits का अनुमान लगाया जाता है। mining क्षेत्रों के पर्यावरणीय प्रभाव (environmental impact) और reclamation की स्थिति का अध्ययन भी remote sensing से किया जाता है।

          NRSC और ISRO geological mapping में remote sensing डेटा का उपयोग करते हैं।

D)  अन्य अनुप्रयोग

        इसके अतिरिक्त remote sensing के कई अन्य महत्वपूर्ण अनुप्रयोग हैं।

1)    कृषि क्षेत्र में

👉    crop yield prediction,
👉   pest और
👉      disease detection तथा
👉      precision farming के लिए

                     satellite data का उपयोग किया जाता है।

         Resourcesat और Sentinel उपग्रह फसल की स्थिति का आकलन करने में सहायक होते हैं।

2) वन और पारिस्थितिकी (forest and ecology) में

👉   deforestation, ( निर्वनीकरण)
👉   biomass estimation ( बायोमास का अनुमान) और
👉   biodiversity monitoring ( जैव विविधता की निगरानी)

          के लिए remote sensing उपयोगी है।

3)    शहरी नियोजन (urban planning) में

👉   Land Use Land Cover (LULC) mapping ( भूमि उपयोग)  तथा
👉   urban expansion ( शहरी विस्तार)   का अध्ययन किया जाता है।

4)    पर्यावरण अध्ययन में

👉   climate change monitoring  ( जलवायु परिवर्तन निगरानी)
👉    air pollution mapping
👉   और greenhouse gas assessment

       किया जाता है।


           सुदूर संवेदन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह Spatial (स्थानिक), Temporal (समय आधारित) और Spectral (तरंग आधारित) जानकारी प्रदान करता है, जिससे बड़े क्षेत्रों का अध्ययन कम समय में संभव होता है।
         भारत में ISRO के कार्यक्रम जैसे

👉    NNRMS (National Natural Resources Management System),
👉   DMSP (Disaster Management Support Programme) और
👉     Bhuvan geoportal ने

       remote sensing को नीति निर्माण और संसाधन प्रबंधन में महत्वपूर्ण बना दिया है।

         भविष्य में Artificial Intelligence (AI) और Machine Learning (ML) के साथ remote sensing के एकीकरण से डेटा विश्लेषण अधिक सटीक और तेज होगा। Google Earth Engine जैसे प्लेटफॉर्म बड़े डेटा के विश्लेषण को सरल बना रहे हैं। इस प्रकार remote sensing आधुनिक विज्ञान की एक अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीक है, जो प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग (sustainable use) और आपदा प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।


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Concept
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🏵️    प्रिसिजन कृषि (Precision Agriculture)

       प्रिसिजन कृषि एक आधुनिक कृषि पद्धति है जिसमें सेंसर, GPS, ड्रोन, सैटेलाइट और डेटा विश्लेषण की मदद से खेत के हर हिस्से की जरूरत के अनुसार पानी, उर्वरक, बीज और कीटनाशक दिया जाता है।
       इसका मुख्य उद्देश्य कम लागत में अधिक उत्पादन और संसाधनों का सही उपयोग करना है।


“खेत के हर भाग को उसकी आवश्यकता के अनुसार सटीक (Precise) मात्रा में इनपुट देना ही प्रिसिजन कृषि है।”


प्रिसिजन कृषि कैसे काम करती है?

1️⃣ डेटा संग्रह – सैटेलाइट, ड्रोन, सेंसर से मिट्टी, नमी, फसल की स्थिति की जानकारी
2️⃣ विश्लेषण (Analysis) – कंप्यूटर/GIS से डेटा का अध्ययन
3️⃣ निर्णय (Decision) – कहाँ कितना पानी, खाद या दवा देना है
4️⃣ कार्यान्वयन (Application) – मशीनों द्वारा सटीक मात्रा में इनपुट देना

🌹प्रमुख तकनीकें 🌹

GPS (Global Positioning System) – खेत की सटीक लोकेशन

Remote Sensing – फसल स्वास्थ्य की निगरानी

GIS (Geographic Information System) – डेटा विश्लेषण

Drones – फसल का सर्वेक्षण और स्प्रे

Sensors – मिट्टी की नमी, तापमान मापना


🌹उपयोग (Applications) 🌹

मिट्टी की उर्वरता का विश्लेषण

सिंचाई प्रबंधन (Irrigation management)

उर्वरक का संतुलित उपयोग

रोग और कीट की पहचान

फसल उत्पादन का अनुमान

🌹लाभ (Advantages) 🌹

✔ कम लागत में अधिक उत्पादन
✔ पानी, खाद, दवा की बचत
✔ पर्यावरण संरक्षण
✔ फसल की गुणवत्ता बेहतर
✔ जोखिम कम

🌹उदाहरण🌹

ड्रोन से खेत की फोटो लेकर कमजोर फसल वाले क्षेत्र की पहचान

सेंसर से पता लगाना कि किस जगह ज्यादा पानी चाहिए


🏵️   Remote Sensing में Spatial, Temporal और Spectral तीनों प्रकार के डेटा बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। ये बताते हैं कि कहाँ, कब और किस प्रकार की ऊर्जा से जानकारी प्राप्त हुई है।


1️⃣ Spatial (स्थानिक) डेटा – कहाँ? 📍

Spatial का अर्थ है स्थान (Location) से संबंधित जानकारी।

यह बताता है कि पृथ्वी की सतह पर कोई वस्तु किस जगह पर स्थित है।Spatial resolution से पता चलता है कि इमेज कितनी स्पष्ट (clear) है।

उदाहरण:

सैटेलाइट इमेज में नदी, जंगल, शहर, खेत की स्थिति पहचानना

1 मीटर resolution वाली इमेज ज्यादा स्पष्ट होगी, 30 मीटर वाली कम


2️⃣ Temporal (कालिक) डेटा – कब?

Temporal का अर्थ है समय (Time) से संबंधित जानकारी।

यह बताता है कि डेटा किस समय या कितनी बार लिया गया है। इससे हम समय के साथ बदलाव (change) देख सकते हैं।

🌹उदाहरण🌹

हर 15 दिन में ली गई सैटेलाइट इमेज से फसल की वृद्धि देखना

हर 30 मिनट में मौसम उपग्रह से बादलों की स्थिति देखना


3️⃣ Spectral (स्पेक्ट्रल) डेटा – कैसे?

Spectral का अर्थ है तरंगदैर्ध्य (Wavelength) या ऊर्जा के प्रकार से संबंधित जानकारी।

      सैटेलाइट विभिन्न प्रकार की Electromagnetic waves (Visible, Infrared, Microwave) को मापता है। अलग-अलग वस्तुएँ अलग-अलग ऊर्जा परावर्तित करती हैं, जिससे उनकी पहचान होती है।

🌹उदाहरण🌹

पौधे Infrared में अलग दिखाई देते हैं

पानी और मिट्टी का अलग spectral signature होता है

🇮🇳Trick🇮🇳

Spatial = कहाँ (Where)

Temporal = कब (When)

Spectral = कैसे / किस तरंग से (How)


🏵️  NDVI

     NDVI (Normalized Difference Vegetation Index) एक Remote Sensing आधारित सूचकांक (index) है, जिसका उपयोग वनस्पति (vegetation) की स्थिति और स्वास्थ्य का आकलन करने के लिए किया जाता है।
        यह सैटेलाइट (उपग्रह) से प्राप्त डेटा के आधार पर बताता है कि किसी क्षेत्र में हरियाली कितनी है और पौधे कितने स्वस्थ हैं।


🏵️   Hyperspectral Sensors क्या होते हैं?

            Hyperspectral sensors ऐसे उन्नत (advanced) सेंसर होते हैं जो बहुत अधिक और बहुत संकीर्ण (narrow) wavelength bands में डेटा एकत्र करते हैं।

      ये सेंसर सैकड़ों spectral bands में पृथ्वी की सतह से परावर्तित (reflected) ऊर्जा को मापते हैं, जिससे किसी वस्तु की बहुत सूक्ष्म पहचान (detailed identification) संभव हो जाती है।

👉 Hyperspectral sensor = बहुत ज्यादा रंगों (bands) में पृथ्वी की फोटो लेकर उसकी सटीक पहचान करना


🏵️   SAVI = NDVI का सुधारित (improved) रूप, जो मिट्टी के प्रभाव को कम करके पौधों की वास्तविक स्थिति बताता है।

           SAVI (Soil Adjusted Vegetation Index) एक vegetation index है, जिसका उपयोग वनस्पति (vegetation) की स्थिति मापने के लिए किया जाता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ मिट्टी (soil) का प्रभाव अधिक होता है.
(जैसे कम घनी फसल या शुष्क क्षेत्र)।

🌹SAVI की आवश्यकता क्यों?🌹

कई बार NDVI में समस्या होती है:
जहाँ वनस्पति कम होती है
मिट्टी ज्यादा दिखाई देती है
सूखे या बंजर क्षेत्र
इन स्थितियों में soil reflectance NDVI को प्रभावित करता है।
👉 SAVI मिट्टी के प्रभाव को adjust कर देता है।



🏵️   Soil Organic Carbon (SOC) क्या है?

        Soil Organic Carbon (SOC) मिट्टी में मौजूद कार्बन (Carbon) की वह मात्रा है जो जैविक पदार्थ (organic matter) से आती है, जैसे:

पौधों के अवशेष 🌾
पत्तियाँ 🍂
जड़ें 🌱
सूक्ष्म जीव (microorganisms) 🦠
खाद / गोबर (manure)

👉    मिट्टी में मौजूद जैविक पदार्थ से प्राप्त कार्बन = Soil Organic Carbon (SOC)


🏵️   difference between
Multispectral vs Hyperspectral  



🏵️   Spectral Signature

       Spectral Signature का अर्थ है किसी वस्तु (जैसे खनिज, मिट्टी, पौधे) द्वारा अलग-अलग wavelength (तरंगदैर्ध्य) पर प्रकाश को reflect (परावर्तित) करने का विशिष्ट पैटर्न।
हर खनिज का reflectance pattern अलग होता है, इसलिए उपग्रह सेंसर से उसकी पहचान की जा सकती है।


🏵️ Structural Mapping

       Fault और Fracture Mapping मुख्यतः Geological Mapping (भूवैज्ञानिक मानचित्रण) का हिस्सा है, जिसे Remote Sensing और GIS की सहायता से किया जाता है

👉 यह Structural Mapping भी कहलाता है क्योंकि इसमें पृथ्वी की सतह की संरचनात्मक विशेषताएं (structures) जैसे:
Fault (भ्रंश)
Fracture (दरार)
Lineament (रेखीय संरचना)
का अध्ययन किया जाता है।

🌹Mineral deposits से संबंध🌹

अधिकांश खनिज (minerals) इन क्षेत्रों में पाए जाते हैं

👉    जहाँ चट्टानों में दरार होती है
👉   जहाँ magma गुजरता है

Fault और fracture zones:

👉 minerals जमा होने के लिए अनुकूल स्थान होते हैं

उदाहरण:
gold
copper
iron ore
uranium


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RENESHA IAS 
9661163344
By RAVI SIR SONY MAM
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