Hindi sahitya for jpsc and jssc cgl

🌹RENESHA IAS🌹 BY..... ✍️ RAVI KUMAR... (IAS JPSC UPPSC INTERVIEW FACED)





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🌹 हिंदी साहित्य JSSC CGL 🌹

✍️ हिंदी साहित्य का नामकरण काल निर्धारण



1) हिंदी साहित्य के व्यवस्थित रूप से अध्ययन करने के लिए आवश्यक है कि हिंदी साहित्य को दीर्घ अवधि वाले असमान परिवर्ती वाले कई कालों में विभाजित कर दिया जाए और साथ ही उसका नामकरण भी कर दिया जाए.

2) हिंदी साहित्य में काल निर्धारण किस समस्या प्रारंभ में बनी रही थी.... हिंदी साहित्य के प्रारंभिक इतिहासकार जैसे गार्सा द तासी और शिव सिंह सेंगर ने हिंदी साहित्य के काल विभाजन का कोई प्रयास नहीं किया... अगर देखा जाए तो पहली बार काल विभाजन और नामकरण का प्रयास सर जॉर्ज ग्रियर्सन के द्वारा किया गया. इन्होंने हिंदी साहित्य को कुल 11 काल खंडों में विभाजित किया....  परंतु सर जॉर्ज ग्रियर्सन के के द्वारा काल विभाजन अव्यवस्थित था.

3) मिश्र बंधु के द्वारा अंत तक 1913 ईस्वी में मिश्र बंधु विनोद नामक अपने पुस्तक में हिंदी साहित्य कोआठ काल खंडों में विभाजित किया गया....

जिस का विवरण निम्न है

A) आरंभिक काल        700 AD -1444 AD

B) मध्यकाल               1445 AD -1680 AD

C) अलंकृत काल         1681 AD-1889 AD

D) परिवर्तन काल         1890 AD-1925 AD

E) वर्तमान काल           1926AD- अब तक

मिश्र बंधु के द्वारा आरंभिक काल मध्यकाल और अलंकृत काल को पुनः दो दो भागों में विभाजित किया गया...

🌹 आलोचना 🌹

A) मिश्र बंधु के द्वारा काल के विभाजन और नामकरण के स्पष्ट आधार नहीं बताया गए... जिसके कारण रामचंद्र शुक्ल का कहना था कि इस तरीके से बिना आधार के मनमाने तरीके से विभाजन को इतिहास नहीं कहा जाता है... इसे कवि वृत्त कर सकते हैं

B) आरंभिक मध्य और वर्तमान काल जहां विकास स्वाधीनता के सूचक हैं वही अलंकृत या परिवर्तन काल आंतरिक प्रवृत्ति के आधार पर हैं.

C) परिवर्तन काल तो प्रत्येक दो कालों के बीच अस्तित्व में होता है... फिर केवल एक स्थान पर देने की जरूरत ही क्या थी?

2) रामचंद्र शुक्ल के द्वारा काल विभाजन और नामकरण

रामचंद्र शुक्ल का कहना था कि

" हिंदी साहित्य का इतिहास संबंधित क्षेत्र के जनता के चितवृत्तियों का इतिहास होता है... जनता के चितवृत्तियों में परिवर्तन के साथ साथ... हिंदी के साहित्य में भी परिवर्तन होता जाता है.... जनता की चित्तवृत्ति तत्कालीन आर्थिक सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं. "

.... अपने इन्हीं विचारों के आधार पर रामचंद्र शुक्ल ने  हिंदी साहित्य के काल खंडों का विभाजन किया और उसका नामकरण किया. रामचंद्र शुक्ल के द्वारा हिंदी साहित्य को मात्र चार मुख्य काल खंडों में विभाजित किया गया...हलांकि इन काल खंडों के कई उप विभाजन भी इनके द्वारा किए गए.......

A) आदिकाल

✍️ वीरगाथा काल    1050 AD -1375 AD

B) पूर्व मध्यकाल

✍️ भक्तिकाल         1375 AD - 1700 AD

C) उत्तर मध्यकाल 

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✍️ रीतिकाल           1700 AD - 1900 AD

D) आधुनिक काल

✍️ गद्यकाल              1900 AD - 1984 AD

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के द्वारा जो आदिकाल पूर्व मध्यकाल,  उत्तर मध्यकाल  या आधुनिक काल जैसे नाम दिए गए हैं...... केवल यह बताने के लिए दिए गए हैं कि अन्य साहित्यकारों के द्वारा  ऐसा कहा जाता है... लेकिन वास्तव में इन सभी का नाम वीरगाथा काल भक्तिकाल रीतिकाल और गद्यकाल है....

✍️ रामचंद्र शुक्ल के द्वारा भक्ति काल को पुनः दो भागों में बांटा गया.... सगुण भक्ति... निर्गुण भक्ति

✍️ सगुण भक्ति के अंतर्गत राम भक्ति और कृष्ण भक्ति को शामिल किया गया...

✍️ वही निर्गुण भक्ति के अंतर्गत ज्ञानाश्रयी धारा ( निर्गुण भक्ति) और प्रेमाश्रयी धारा( निर्गुण सुफी ) को शामिल किया गया

✍️ रामचंद्र शुक्ल के द्वारा रीतिकाल को पुनः तीन भागों में बांटा गया

✍️ रीतिबद्ध, रिद्धिसिद्ध  और रीति मुक्त

✍️ इन सभी भागों की चर्चा भविष्य के कक्षाओं में की जानी है.





🌹 आचार्य रामचंद्र शुक्ल के द्वारा अपनाए गए आधार 🌹

✍️ रामचंद्र शुक्ल के द्वारा वर्ष 1929 में प्रसिद्ध "हिंदी के साहित्य का इतिहास" नामक पुस्तक लिखी गई.

✍️ आचार्य रामचंद्र शुक्ल के द्वारा हिंदी साहित्य के इतिहास विभाजन हेतु दो आधार अपनाए गए

A) संबंधित काल के ग्रंथों की प्रमुख प्रवृत्ति

✍️ अगर इससे काल के ग्रंथों की मुख्य प्रवृत्ति भक्ति से संबंधित है तो इस काल को भक्तिकाल कहा जा सकता है.... जैसे किसी काल में अगर 15 ग्रंथ मुख्य रूप से लिखे गए हैं  इनमें से 11 ग्रंथ भक्ति से संबंधित है... तो इससे भक्ति काल में शामिल किया जाएगा.....

यद्यपि शुक्ला जी ने यह कभी नहीं कहा कि किसी भी काल में सिर्फ और सिर्फ एक प्रवृत्ति के ग्रंथ लिखे लिखे जाते हैं.... इन्होंने सिर्फ प्रमुखता के बात की.

B) ग्रंथों के प्रसिद्धि और लोकप्रियता

किसी भी काल में अनेक तरह के ग्रंथ बड़ी संख्या में लिखे जाते रहे हैं....  इसका अर्थ यह नहीं है कि आचार्य  रामचंद्र शुक्ल के द्वारा... उन सभी ग्रंथों को बराबर महत्व दे दिया गया.... रामचंद्र शुक्ल ने सिर्फ उन्हीं ग्रंथों का महत्व दिया जो अत्यधिक प्रसिद्ध थे और लोकप्रिय थे... क्योंकि रामचंद्र शुक्ल का मानना था कि

      " ग्रंथों की प्रसिद्धि और लोकप्रियता भी किसी काल के जनता के  प्रवृत्ति की प्रतिध्वनि होती है "

किन्ही दो आधारों पर इन का काल निर्धारण और नामकरण निर्धारित किया गया.

🌹 शुक्ल जी द्वारा किए गए काल विभाजन की विशेषताएं 🌹

A) शुक्ल जी के द्वारा हिंदी साहित्य के इतिहास से अपभ्रंश भाषा को पूरी तरह से निकाल दिया गया... इस कारण इनका वीरगाथा काल 1050 AD से शुरू होता है.

B) शुक्ल जी के द्वारा मात्र चार काल खंडों का निर्धारण किया गया जो हिंदी साहित्य के लिए छात्रों और अध्यापकों के लिए बहुत सुविधाजनक सिद्ध हुआ.

C) शुक्ल जी का काल विभाजन सरल स्पष्ट और तर्कसंगत है.... इस कारण वीरगाथा काल को छोड़कर अन्य किसी भी कॉल पर आज तक किसी भी साहित्यकार के द्वारा  प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया गया है.

🌹 शुक्ला जी के विभाजन की आलोचना 🌹

A) शुक्ल जी के द्वारा कुछ अपभ्रंश साहित्य को हिंदी साहित्य बाहर कर दिया गया लेकिन उत्तर कालीन अपभ्रंश साहित्य को हिंदी साहित्य में शामिल किया गया है

जैसे

✍️ विजयपाल रासो नल्ल सिंह

✍️ हम्मीर रासो        सारंगधर

✍️ कीर्ति लता और
    कीर्ति पताका          विद्यापति

B) कई विद्वानों के द्वारा माना जाता है कि हिंदी का विकास 1000 AD से ही शुरु हो चुका था, पर शुक्ल जी ने वीरगाथा काल को 1050 AD से शुरू किया है.

C) शुक्ला  जी के वीरगाथा काल के नाम पर भी कई विद्वानों ने आपत्तियां दर्ज किए हैं... इन विद्वानों का कहना है कि जिन ग्रंथों के आधार पर शुक्ला जी ने वीरगाथा काल नामकरण किया है...  उनमें से कई ग्रंथ प्रमाणिक, अस्तित्वहीन या परवर्ती काल के सिद्ध हो चुके हैं
जैसे

✍️ पृथ्वीराज रासो अप्रमाणिक सिद्ध हो चुका है

✍️ जयचंद प्रकाश अस्तित्वहीन सिद्ध हो चुका है

✍ खुमान रासो परवर्ती काल के सिद्ध हो चुके हैं...

... आलोचना तो किया जा सकता है परंतु ये आलोचना.. बहुत ज्यादा प्रभावी नहीं है क्योंकि... आचार्य शुक्ल के द्वारा हिंदी साहित्य का इतिहास लिखे हुए लगभग 90 साल हो चुके हैं...  इस अवधि में कई तरह के शोध हुए और कई जानकारियां प्राप्त हुई. इन जानकारियों के आधार पर शुक्ल जी के हिंदी साहित्य के इतिहास में संशोधन कर इस पुस्तक को वर्तमान समय के लिए भी पूरी तरह से उपयुक्त बनाया जा सकता है.

2) राजकुमार वर्मा

राजकुमार वर्मा के द्वारा

" हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास"

लिखा गया. इस पुस्तक में इन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास को कई काल खंडों में विभाजित किया है.... इनके विभाजन पर ना सिर्फ रामचंद्र शुक्ल के विभाजन का प्रभाव है बल्कि मिश्र बंधु के विभाजन का भी प्रभाव है.

A) संधि काल           750 AD - 1000 AD

B) चारण काल         1000 AD-1375 AD

C) भक्ति काल          1375 AD-1700 AD

D) रीतिकाल             1700 AD- 1900AD

E) आधुनिक काल     1900AD- 1900 AD

मिश्र बंधुओं से प्रभावित होकर राजकुमार वर्मा के द्वारा संधिकाल जोड़ा गया . राजकुमार वर्मा का मानना था कि संधि काल में  अपभ्रंश का प्रभाव  घट रहा था और हिंदी का प्रभाव पड़ रहा था.राजकुमार वर्मा ने वीरगाथा काल की जगह चारण शब्द का प्रयोग किया... हलांकि इसमें कुछ तात्विक अंतर नहीं था....क्योंकि चारण उन कवियों को कहा जाता था जो वीरगाथा से संबंधित कविताएं लिखते थे.... इसके अलावा राजकुमार वर्मा के द्वारा शुक्ला जी के गद्य काल को आधुनिक काल कहना पसंद किया गया.

3) गणपतिचंद्र गुप्त का काल विभाजन

✍️ गणपतिचंद्र गुप्त के द्वारा "हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास" नामक पुस्तक लिखी गई है.

✍️ गणपतिचंद्र गुप्त रामचंद्र शुक्ल के इस विचार का समर्थन किया कि हिंदी साहित्य का इतिहास जनता की चित्तवृत्तियों का इतिहास होता है....  परंतु गणपति चंद्र ने शुक्ला जी के इस बात को स्वीकार नहीं किया कि किसी विशेष काल में विशेष प्रवृत्ति  के ग्रंथों का हे लेखन किया जाता है..... अगर एक और वीरता से संबंधित ग्रंथ लिखे जा रहे थे तो दूसरी ओर भक्ति या रस से संबंधित ग्रंथ भी लिखे जा रहे थे.

✍️ गणपति चंद्र गुप्त के द्वारा हिंदी साहित्य के कालखंड को तीन भागों में बांटा गया

A) प्रारंभिक काल   1184 से 1350

B) मध्यकाल          1350 से 1857

C) आधुनिक काल   1857 से 1965

✍️ गणपति चंद्र ने प्रारंभिक काल और मध्य काल को तीन भागों में विभाजित किया

* राज्य आश्रित

* धर्म आश्रित

* लोक आश्रित

✍️ इस प्रकार गणपति चंद्र ने कुल 7 भागों में विभाजित किया...

✍️ इनके विभाजन अत्यंत क्लिष्ट और दुर्बोध हैं... इस कारण अधिक मान्यता प्राप्त नहीं है...

🌹 निष्कर्ष 🌹

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि वर्तमान में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के द्वारा दिए गए विभाजन और नामकरण को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है.

🌹 कुछ प्रमुख तथ्य जिससे याद करना जरूरी है...🌹

1) आदिकाल को अलग-अलग साहित्यकारों के द्वारा अलग-अलग नाम दिए गए हैं

✍️ रामचंद्र शुक्ल ने इसे वीरगाथा काल कहा है

✍️ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस काल को अधिक काल के संज्ञा दी है... यह सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है.

✍️ आचार्य महावीर  प्रसाद द्विवेदी ने  इस कॉल को  बीज वपन का काल कहा है

✍️ राजकुमार वर्मा ने इस काल को चारण काल कहां है

✍️ राहुल संस्कृतयान के द्वारा इस काल को सिद्ध सामंत काल कहा है.

✍️ मिश्र बंधुओं के द्वारा इस काल को आरंभिक काल कहा गया है जबकि गणपति चंद्र शुक्ल के द्वारा इस काल को प्रारंभिक काल कहा गया है.

2) हिंदी के काल खंडों का नामकरण कई आधारों पर किया जाना संभव है

✍️ विकासवादीता के आधार पर

* आदिकाल मध्यकाल आधुनिक काल इत्यादि

✍️ साहित्यकारों के नाम के आधार पर

* द्विवेदी युग/ शुक्ल युग/ भारतेंदु युग इत्यादि

✍️ साहित्यिक प्रवृत्तियों के आधार पर

* छायावाद प्रयोगवाद प्रगतिवाद इत्यादि

Classes by रवि सर....

🌹 इस प्रकार यह टॉपिक समाप्त होता है फिर मिलते हैं अगले टॉपिक के साथ 🌹


🌹 हिंदी साहित्य का आदिकाल 🌹

✍️ हिंदी साहित्य के आदिकाल पर अपभ्रश रचनाओं का प्रभाव

अपभ्रंश को हिंदी साहित्य में पूरी तरह से  शामिल करने वाले विद्वानों में से प्रमुख हैं

✍️ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

✍️ पीतांबर दत्त वडथवाल

✍️ चंद्रधर शर्मा गुलेरी

✍️ राहुल सांकृत्यायन

चंद्रधर शर्मा गुलेरी के द्वारा नागरी प्रचारिणी सभा में कुछ अपभ्रंश साहित्य को प्रकाशित कराया गया था. 1913 -14 में जर्मन विद्वान हरमन याकोवी के द्वारा.... दो अपभ्रंश साहित्य...

* भविष्यत कहा

* नेमिनाथ चरित

के बारे में साहित्य जगत को परिचित कराया गया.... इसके बाद संदेश रासक सहित अन्य अनेक अपभ्रंश साहित्य  का संकलन हुआ.. इधर राहुल सांकृत्यायन के द्वारा पुष्पदंत और स्वयंभू द्वारा रचित रचनाओं का संकलित किया गया और हिंदी काव्यधारा में प्रकाशित कराया गया.

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आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के द्वारा हिंदी साहित्य की भूमिका में स्पष्ट रूप से कहा गया कि अपभ्रंश साहित्य हिंदी साहित्य के ही भाग हैं.

अगर अपभ्रंश भाषा के प्रारंभिक प्रयोग की बात की जाए तो सबसे पहले इसका साक्ष्य पंतजलि के महाभाष्य में मिलता है...

इसके अलावा भरतमुनि का नाट्यशास्त्र में भी अपभ्रंश भाषा के प्रयोग के साक्ष्य मिले हैं...

हिंदी में रचना करने वाले परिवर्ती  कवियों की रचनाओं में भी अब भ्रंश भाषा का स्पष्ट प्रभाव दिखता है....

जैसे

✍️ केशव दास ने अपनी रामचंद्रिका में स्वयं स्वीकार किया है कि उन्होंने छंद रचना हेतु जैन ग्रंथ जिनसेन चरित का मदद लिया

✍️ तुलसीदास के रामायण पर स्वयंभू के पउम चरित्र जैन रामायण का प्रभाव प्रतीत होता है क्योंकि इनके द्वारा गुरुवाणी के साथ शुरुआत की गई है.

✍️ मीराबाई की रचनाओं पर विद्यापति के कीर्तिलता का प्रभाव स्पष्ट है.

✍️ सूरदास की रचनाओं पर गाथासप्तशती का प्रभाव स्पष्ट  है.

✍️ रीतिकालीन कवियों जैसे सूरदास देव और मतिराम की रचनाओं पर गाथा सप्तशती का प्रभाव प्रतीत होता है.

✍️ चंदबरदाई के पृथ्वीराज रासो में वीर रस और श्रृंगार रस दोनों का विवरण मिलता है... इस पर संदेश रासक और ढोला मारू री दोहा का प्रभाव दिखता है....

✍️ ढोला मारु का प्रभाव बाद के कई रचनाओं जैसे पद्मावत मधुमालती और मृगावती पर प्रतीत होता है....

🌹 पद्मावत मलिक मोहम्मद जायसी
🌹 मधुमालती मंजन
🌹 मृगावती    कुतवन

✍️ इन सभी रचनाओं में प्रेमिका के विरह की अनुभूति को ऋतु वर्णन के अनुसार स्पष्ट किया गया है.... इनमें संयोग वियोग के साथ-साथ पंछियों के रूप में संदेशवाहक को महत्व दिया गया है जो समानता प्रकट करते हैं.

✍️ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर की रचनाओं को भी पूर्व संतो से प्रेरित माना है....

" वही दोहे, वही पद...... वही राग रागनियां.... वही चौपाइयां... जो पूर्व संतो ने प्रयोग की थी कबीर ने भी किया  "

✍️ आदिकालीन  रचनाओं में छंद और अलंकार भी अपभ्रंश साहित्य से प्रभावित हैं...

* छंदों में अगर देखा जाए तो दोहा,सोरठा अरिल्ल,उल्लाला विशेष रूप से प्रयोग किए गए थे.
* अलंकारों में अगर देखा जाए तो रूपक उपमा अतिशयोक्ति.... इत्यादि पर अपभ्रंश साहित्य का प्रभाव प्रतीत होता है...

🌹 आदिकाल का नामकरण 🌹

इस पर पिछले क्लास में चर्चा हो चुके हैं.... यहां पर सिर्फ यह बताना उचित प्रतीत होता है कि आदिकाल का सर्वाधिक मान्य नाम आदिकाल ही है जो अचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के द्वारा दिया गया....

✍️ इसके अलावा अचार रामचंद्र शुक्ल के द्वारा कुल 12 ग्रंथों के आधार पर आदिकाल को वीरगाथा काल का नाम दिया गया है... लेकिन एक चीज ध्यान रखेंगे कि वीरगाथा शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग मिश्र बंधु के द्वारा किया गया था...

✍️ आचार्य रामचंद्र शुक्ल के द्वारा  वीरगाथा काल का नामकरण जिन ग्रंथों के आधार पर हुआ उनमें से शामिल है

🌹 अपभ्रंश काव्य 🌹

1) विजयपाल रासो.....नल्ल सिंह

2) हमीर देव रासो.....  सारंगधर

3/4) कीर्ति लता और...... विद्यापति
    कीर्ति पताका

🌹 अपभ्रंश प्रभाव वाले काव्य 🌹

1) बीसलदेव रासो...... नरपति नल्ह

2) पृथ्वी राज विजय..... चंद्रवरदाई

3) खुमान रासो..........

4) परिमल रासो...........जयनिक

5) जयचंद्र प्रकाश...... मधुकर

6) जयमयंक जसचंद्रिका.... मधुकर

7) खुसरो की पहेलियां.... अमीर खुसरो

8) विद्यापति पदावली...... विद्यापति

इन 12 ग्रंथों में बीसलदेव रासो खुसरो की पहेलियां और विद्यापति पदावली को छोड़कर बाकी सभी वीर रस से संबंधित हैं.... इसलिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने आदिकाल को  वीरगाथा काल नाम दिया.

🌹 आदिकाल के रचनाओं के समय में भारत की स्थिति🌹

1) राजनीतिक स्थिति

✍️ भारत में राजनीतिक अनेकता का अभाव था... परमार प्रतिहार चंदेल  के अलावा कई अन्य राजपूत वंश वाले राजा आपस में संघर्ष में व्यस्त रहते थे....

✍️ मोहम्मद गजनबी का क्रमांक 10 वीं सदी में शुरू हुआ और मोहम्मद गौरी का आक्रमण 12 वीं सदी में.... भारतीय शासक इन आक्रमणकारियों का मुकाबला करने में सफल नहीं हो सके.

2) धार्मिक स्थिति और सांस्कृतिक स्थिति  ..... इस काल में हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध धर्म भी ... कहीं ना कहीं हो चुका था

✍️ हिंदू धर्म में नाथपंथी प्रभावी हो चुके थे... शिवम के कई उग्र पंथ जैसे... पाशुपत कपालिक...  विकसित हो चुका था.... नाथ पंथ भोग विलास में विश्वास रखते थे और बाह्य आडंबर से मुक्त थे.

✍️ बौद्ध धर्म का विकृत रूप वज्रयान कहा गया..... इनके अनुयायियों को ही सिद्धपंथी का गया....

✍️ जैन धर्म को मानने वाले पश्चिम भारत सहित कर्नाटक में भी थे.

✍️ सांस्कृतिक रूप से स्थापत्य कला का विकास हुआ था जिसमें नागर बेसर और द्रविड़ शैली का विकास हुआ था.

3) सामाजिक  स्थिति...

✍️ जनता को ना तो शासन और ना ही धर्म का भरोसा मिल पाया था जिस कारण जनता दिग्भ्रमित हो चुके थे...

✍️ जनता अशिक्षित थी

✍️ सती प्रथा विद्यमान था शूद्रों के साथ भेदभाव जारी थे.

✍️ बाह्य आक्रमण महामारी या दुर्भिक्ष कुछ भी हो सभी धर्म की जगह धर्म की ओर मुड़ जाते थे... यज्ञ कर्मकांड के द्वारा इन समस्याओं से मुक्ति पाने का प्रयास करते  थे...

इन परिस्थितियों में सामान्य बात की थी साहित्य पर इन परिस्थितियों का प्रभाव पड़ना निश्चित था.... साहित्य के क्षेत्र में यही कारण था कि युद्ध, वीरता की रचनाएं मुख्य रूप से की गई.... इसके अलावा कुछ रचनाएं अध्यात्मवादी भी हुई.....

चारण कवियों के द्वारा राजाओं के पराक्रम, विजय..... और शत्रु कन्याओं के अपहरण... काश जी और ओजस्वी विवरण दिया गया..... उनके द्वारा युद्ध उन्माद भड़काने के लिए रचनाएं की जाती थी.... इनकी रचना अतिशयोक्ति पूर्ण होते थे....


🌹 आदिकाल की प्रवृत्तियां 🌹

आदिकाल के परिवर्तन को हम लोग निम्न बिंदुओं के अंतर्गत अध्ययन कर सकते हैं...

1) आदिकाल की कई रचनाएं संदिग्ध है

✍️ आदिकाल की रचनाएं संदिग्ध है क्योंकि इनमें कई बार संशोधन और परिवर्तन किया गया है...

✍️ अब तो यह भी आशंका उत्पन्न हो गई है... यह ग्रंथ उस राजा के काल के हैं या नहीं जिस राजा के नाम से ग्रंथ को लिखा गया है.

2) ऐतिहासिक घटनाओं का सही विवरण नहीं...

आदिकाल के रचनाओं के नायक या नायिका तो ऐतिहासिक है...  परंतु जिस तरीके से विवरण दिया गया है वह तिथि के अनुसार तथा घटनाओं के घटने के अनुसार असत्य प्रतीत होते हैं..... उदाहरण के लिए पृथ्वीराज रासो....में पृथ्वीराज को ऐसे राजाओं के विरुद्ध भी विजयी बना दिया गया है जो राजा उसकी काल के पहले या बाद के थे... दूसरे शब्दों में समकालीन नहीं थे.

3) संकुचित दृष्टिकोण.... आदिकाल के प्रसिद्ध कवियों को किसी न किसी राजा का संरक्षण प्राप्त था.... अपने रचनाओं  के माध्यम से राजा के गुणगान में लगे रहते थे.... इस काल में राष्ट्र की अवधारणा भी अलग थी... जैसे मेवाड़ को चंदेल या कन्नौज से अलग राष्ट्र  समझा जाता था.... चंदेलों के उत्थान और पतन से किसी तरह हर्ष या विषाद... अन्य राजाओं को नहीं होता था.... लोकजीवन सुख-दुख समस्याओं से इन कमियों को कोई मतलब नहीं था....

4) युद्ध का विवरण

युद्ध का विवरण प्रदान करने वाले कभी चारण या भाट कहलाते थे.... इन्होंने युद्ध का विवरण सजीवता और ओजस्विता के साथ किया .... यह अपनी रचनाओं के माध्यम से युद्ध उन्माद उत्पन्न करते थे और क्षत्रियों में जोश उत्पन्न करते थे....

🌹 इस काल के चार अन्य भाट सिर

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